बच्चों ने किया माता-पिता पूजन, लिया आशीर्वाद
बिना शिक्षा के जीवन सबसे बड़ा अभिशाप : शैलेन्द्र कृष्ण शास्त्री
झरनेश्वर कॉलोनी, मिसरोद में शिव महापुराण कथा के चतुर्थ दिवस उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
भोपाल। भोपाल के मिसरोद स्थित झरनेश्वर कॉलोनी में आयोजित शिव महापुराण कथा के चतुर्थ दिवस पर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा वाचक धर्मपथिक पूज्य गुरुदेव शैलेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने भगवान शंकर को ब्रह्मांड का सबसे बड़ा गुरु बताते हुए शिव महापुराण की महिमा का विस्तार से वर्णन किया। चतुर्थ दिवस गुरुदेव ने ब्रह्मा-विष्णु में श्रेष्ठता के प्रसंग का वर्णन किया और युवाओं से वेलेंटाइन डे को मातृ-पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाने की अपील की। आज की कथा के दौरान बच्चो ने माता-पिता पूजन का आयोजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्ति किया उन्होने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को शिक्षित नहीं किया, वे अपनी ही संतान के सबसे बड़े शत्रु हैं। बिना शिक्षा के जीवन जीना सबसे बड़ा अभिशाप है। बच्चों को शिक्षित और संस्कारी बनाना प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य है। उन्होंने मिशनरी स्कूलों का विरोध करते हुए विद्या भारती, संस्कार भारती, बाल मंदिर और गुरुकुल जैसे संस्थानों में शिक्षा देने का आह्वान किया, जहाँ विद्या के साथ-साथ सनातन संस्कार भी मिलते हैं।
कथा के दौरान गुरुदेव ने सनातन संस्कृति की व्यापकता पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हम सनातनी पूरी धरती को माँ और पूरे विश्व को परिवार मानते हैं। हम किसी को छेड़ते नहीं, लेकिन यदि हमें छेड़ा गया तो छोड़ते भी नहीं। इस दौरान गुरुदेव ने जोशीली गर्जना करते हुए कहा—
यदि मेरा बस चले तो हर घर में भगवा लहरा दूँ,
दुनिया के हर व्यक्ति के मुख से राम नाम कहलवा दूँ।
एकता की कमी हम हिन्दुओं में ही रह गई,
वरना अयोध्या में ही नहीं, पाकिस्तान में भी
राम मंदिर बनवा दूँ।”
उन्होंने यह भी कहा कि आने वाला समय ऐसा होगा जब भारत के हर घर पर भगवा लहराएगा। कथा के अंत में गुरुदेव ने कैलाश पर्वत का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार बाघ, नंदी, सर्प, मोर जैसे स्वभाव से वैरी प्राणी भी शिव के सान्निध्य में अनुशासन और प्रेम से रहते हैं, उसी प्रकार शिव भक्त भी अनुशासनप्रिय होते हैं। चतुर्थ दिवस की कथा के समापन पर भक्तों ने शिव चरित्र को जीवन में उतारने का संकल्प लिया। आरती और प्रसाद ग्रहण कर श्रद्धालु अगले दिन की कथा सुनने की उत्कंठा के साथ विदा हुए।