भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों में निर्णायक करवट
भारत–अमेरिका आर्थिक रिश्तों के परिदृश्य में यह फैसला किसी साधारण संशोधन जैसा नहीं, बल्कि दिशा बदलने वाली घटना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लागू 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करना भारतीय निर्यात तंत्र के लिए राहत की सांस है। इतना ही नहीं, रूस से तेल आयात पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क का हटना भारत की ऊर्जा रणनीति को भी नई स्थिरता देता है। यह पूरा घटनाक्रम वैश्विक व्यापार संतुलन में भारत की दावेदारी को और सुदृढ़ करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई बातचीत के पश्चात इस निर्णय की घोषणा ने कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा की। भारत सरकार ने इसे सकारात्मक संकेत माना, पर साथ में रखी गई शर्त—भारत में हर वर्ष 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों का करमुक्त व्यापार—ने बहस की नई लकीर खींच दी है।
टैरिफ कटौती: भारतीय निर्यात के लिए खुला नया गलियारा
18 प्रतिशत की संशोधित टैरिफ दर भारत को वियतनाम, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे प्रतिस्पर्धियों के समकक्ष, बल्कि कुछ मामलों में उनसे आगे ले जाती है। मौजूदा समय में पाकिस्तान पर 19 प्रतिशत और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत टैरिफ लागू है। इस तुलना में भारत की स्थिति अधिक अनुकूल बनती दिखती है।
इस बदलाव के परिणामस्वरूप:
- मेड इन इंडिया उत्पादों को अमेरिकी बाजार में स्पष्ट बढ़त मिलेगी।
- भारतीय निर्यातकों की सौदेबाजी शक्ति मजबूत होगी।
- कीमतों में नरमी के साथ मांग का तापमान बढ़ेगा।
यह सब ऐसे दौर में हो रहा है जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं नए सिरे से गढ़ी जा रही हैं और भरोसेमंद साझेदारों की तलाश तेज है।
कपड़ा उद्योग: सबसे बड़ा लाभार्थी
कपड़ा और परिधान क्षेत्र के लिए यह फैसला मरहम की तरह है। बीते महीनों में टैरिफ टकराव की सबसे तीखी चोट इसी उद्योग ने झेली थी। अब परिस्थितियां पलटती नजर आती हैं।
नए समीकरण में:
- भारतीय कपड़ा निर्यातकों को मूल्य-प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलेगी।
- अमेरिका में भारतीय परिधानों की मांग दोबारा रफ्तार पकड़ेगी।
- छोटे और मध्यम निर्यातकों को पुनर्जीवन मिलेगा।
इससे रोजगार सृजन और घरेलू विनिर्माण तंत्र को भी मजबूती मिलने की संभावना है।
500 अरब डॉलर का करमुक्त व्यापार: सुनहरा अवसर या पेचीदा चुनौती?
अमेरिका की यह शर्त भारत के लिए अवसर और जोखिम—दोनों का मिश्रण है। सवाल सीधे और तीखे हैं:
- क्या इसमें अमेरिकी कृषि उत्पादों का दबदबा होगा?
- क्या इससे भारतीय किसानों और स्थानीय बाजार पर दबाव बढ़ेगा?
- क्या यह भारत की व्यापारिक संप्रभुता को सीमित करेगा?
भारत–अमेरिका व्यापार वार्ताएं पहले भी कृषि मुद्दों पर अटक चुकी हैं, जिससे इस शर्त की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।
अमेरिकी रुख: धुंधले संकेत, खुला संवाद
जब इस विषय पर अमेरिकी राजदूत सर्जियों गोर से प्रश्न किया गया, तो उन्होंने गेंद व्यापार वार्ताकारों के पाले में डाल दी। यह कूटनीतिक भाषा में दिया गया ऐसा उत्तर है, जो अनिश्चितता के साथ संवाद की गुंजाइश भी छोड़ता है। स्पष्ट है कि आने वाले महीनों में शर्तों की परिभाषा और व्याख्या निर्णायक भूमिका निभाएगी।
संप्रभुता का प्रश्न: विशेषज्ञ दृष्टि
अर्थशास्त्र और विदेश नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर अबुजर कमालुद्दीन की टिप्पणी इस बहस को गहराई देती है। उनके अनुसार, अमेरिका द्वारा यह संकेत देना कि भारत अब वेनेजुएला से तेल खरीदेगा, संप्रभु निर्णयों में हस्तक्षेप जैसा प्रतीत होता है।
उनकी प्रमुख बातें:
- व्यापारिक साझेदार चुनना भारत का स्वायत्त अधिकार है।
- बाहरी दबाव राष्ट्रीय हितों को प्रभावित कर सकता है।
- आर्थिक फैसलों में रणनीतिक स्वतंत्रता अनिवार्य है।
यह दृष्टिकोण नीति-निर्माताओं के लिए सावधानी का संकेतक है।
भारत की रणनीति: संतुलन की कसौटी
अब तक भारत की प्रतिक्रिया न तो अतिउत्साही है, न ही असंतोष से भरी। यह संतुलित कूटनीति का संकेत देती है। भारत के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर अमेरिकी बाजार में बढ़ी पहुंच का लाभ उठाना, दूसरी ओर घरेलू उद्योगों और किसानों के हितों की सुरक्षा करना। यही संतुलन भविष्य की दिशा तय करेगा।
वैश्विक व्यापार में भारत की उभरती भूमिका
कम टैरिफ दरें भारत को वैश्विक विनिर्माण और निर्यात केंद्र के रूप में उभारने की क्षमता रखती हैं। इससे:
- विदेशी निवेशकों का भरोसा गाढ़ा होगा।
- चीन+1 रणनीति का लाभ भारत को मिल सकता है।
- वैश्विक कंपनियां भारत को दीर्घकालिक सप्लाई हब मानने लगेंगी।
यह संकेत भारत के लिए दूरगामी आर्थिक लाभों की ओर इशारा करता है।
निष्कर्ष: अवसर और सतर्कता का संगम
टैरिफ में कटौती भारत के लिए बड़ा अवसर है, पर 500 अरब डॉलर के करमुक्त व्यापार की शर्त सूक्ष्म मूल्यांकन की मांग करती है। यदि भारत राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे, व्यापार वार्ताओं में स्पष्ट सीमाएं तय करे और घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करे, तो यह समझौता भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की राह पर मजबूती से आगे बढ़ा सकता है।